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ओडिशा में आरक्षण का बड़ा फैसला, SC-ST के साथ SEBC छात्रों को भी मिला लाभ

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ओडिशा सरकार ने SC और ST छात्रों के लिए आरक्षण बढ़ाने के साथ SEBC वर्ग के लिए भी मेडिकल, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा में नया आरक्षण लागू करने का बड़ा फैसला लिया है। नई व्यवस्था विश्वविद्यालयों, प्रोफेशनल कोर्सेज, ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों में लागू होगी।

भुवनेश्वर/आलम की खबर: ओडिशा सरकार ने उच्च शिक्षा और पेशेवर पाठ्यक्रमों में सामाजिक न्याय को नई दिशा देने वाला बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) के छात्रों के लिए आरक्षण व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव को मंजूरी दी गई। इस फैसले के बाद अब राज्य के विश्वविद्यालयों, संबद्ध कॉलेजों, मेडिकल, इंजीनियरिंग, नर्सिंग, फार्मेसी, कृषि, प्रबंधन, आईटीआई, पॉलिटेक्निक और अन्य प्रोफेशनल कोर्सेज में आरक्षण का नया ढांचा लागू होगा।

सरकार के इस निर्णय को ओडिशा की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े नीतिगत बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से यह मांग उठती रही थी कि राज्य की सामाजिक संरचना और आबादी के अनुपात के अनुसार शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाया जाए। अब सरकार ने इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए ST और SC वर्ग के लिए आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने के साथ SEBC वर्ग को भी पहली बार स्पष्ट रूप से शामिल कर दिया है। इससे हजारों छात्रों के लिए मेडिकल, तकनीकी और प्रोफेशनल शिक्षा के दरवाजे पहले की तुलना में ज्यादा व्यापक होने जा रहे हैं।

मंत्रिमंडल के फैसले के मुताबिक, अनुसूचित जनजाति (ST) छात्रों के लिए आरक्षण को 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 22.5 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं अनुसूचित जाति (SC) छात्रों के लिए आरक्षण 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 16.25 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग यानी SEBC के लिए 11.25 प्रतिशत आरक्षण पहली बार लागू किया गया है। इस तरह राज्य सरकार ने शिक्षा में प्रतिनिधित्व को लेकर एक बड़ा संतुलन साधने की कोशिश की है, जिससे विभिन्न वंचित वर्गों को अधिक अवसर मिल सकें।

मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने इस फैसले को सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में ST आबादी 22 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद उन्हें अब तक केवल 12 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा था, जो उनके जनसंख्या अनुपात के अनुरूप नहीं था। सरकार ने इस असंतुलन को दूर करते हुए अब आरक्षण प्रतिशत को बढ़ाने का निर्णय लिया है, ताकि आदिवासी समुदाय के छात्रों को शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा न्यायपूर्ण अवसर मिल सकें।

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सरकार का दावा है कि इस नई व्यवस्था का सीधा असर प्रोफेशनल कोर्सेज में प्रवेश पाने वाले छात्रों की संख्या पर दिखाई देगा। मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में ही इसका बड़ा असर देखने को मिलेगा। नए आरक्षण ढांचे के बाद मेडिकल सीटों में ST छात्रों की संख्या 290 से बढ़कर 545 तक पहुंच सकती है, जबकि SC छात्रों की संख्या 193 से बढ़कर 393 होने का अनुमान है। इसी तरह इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी पाठ्यक्रमों में भी ST, SC और SEBC वर्ग के लिए सीटों की उपलब्धता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

इस फैसले का एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक महत्व भी है। शिक्षा में आरक्षण सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं होता, बल्कि यह अवसरों, प्रतिनिधित्व और भविष्य की सामाजिक भागीदारी का भी सवाल होता है। खासकर मेडिकल, इंजीनियरिंग, नर्सिंग, फार्मेसी, कृषि और प्रबंधन जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज में प्रवेश पाने वाले छात्रों के लिए यह बदलाव उनके पूरे करियर और सामाजिक उन्नति की दिशा बदल सकता है। यही वजह है कि ओडिशा सरकार का यह फैसला केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन की नई रेखा खींचने वाला कदम माना जा रहा है।

राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई आरक्षण व्यवस्था सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे संबद्ध कॉलेजों, ITI, पॉलिटेक्निक संस्थानों और अन्य व्यावसायिक एवं तकनीकी संस्थानों में भी लागू किया जाएगा। इसका मतलब है कि यह बदलाव उच्च शिक्षा के लगभग पूरे ढांचे को प्रभावित करेगा। ग्रामीण, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के छात्र, जो अब तक सीमित अवसरों के कारण प्रोफेशनल शिक्षा से दूर रह जाते थे, उन्हें अब अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इस नीति को सही तरीके से लागू किया गया और सीटों के साथ-साथ शैक्षणिक समर्थन, छात्रवृत्ति, हॉस्टल, कोचिंग और बुनियादी संसाधनों पर भी ध्यान दिया गया, तो इसका सकारात्मक असर बहुत व्यापक हो सकता है। सिर्फ आरक्षण प्रतिशत बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी जरूरी है कि लाभार्थी छात्र उस अवसर का पूरा उपयोग कर सकें। खासकर मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे पाठ्यक्रमों में प्रवेश के बाद टिके रहना, प्रदर्शन बनाए रखना और आगे पेशेवर दुनिया में स्थापित होना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

ओडिशा में आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करता रहा है। ऐसे में ST आरक्षण को 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 22.5 प्रतिशत करना सिर्फ एक संख्या का बदलाव नहीं, बल्कि नीति की प्राथमिकता में परिवर्तन का संकेत भी है। इसी तरह SC आरक्षण में वृद्धि और SEBC वर्ग को पहली बार इस पैमाने पर शामिल करना यह दर्शाता है कि राज्य सरकार शिक्षा के जरिए सामाजिक प्रतिनिधित्व को अधिक व्यापक बनाना चाहती है।

मंत्रिमंडल की बैठक में शिक्षा के अलावा एक और अहम फैसला भी लिया गया। मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि राज्य सरकार वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना शुरू करेगी। इस योजना के तहत लाभार्थियों को हर महीने पांच किलोग्राम अतिरिक्त चावल मुफ्त में दिया जाएगा। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना और जरूरतमंद परिवारों को राहत देना है। यह योजना ऐसे समय में लाई जा रही है जब महंगाई, आजीविका और बुनियादी जरूरतों को लेकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर दबाव लगातार बना हुआ है।

कैबिनेट बैठक में केवल यही दो बड़े फैसले नहीं हुए, बल्कि विभिन्न विभागों से जुड़े 14 अन्य प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई। हालांकि सबसे ज्यादा चर्चा शिक्षा में आरक्षण और अन्नपूर्णा योजना को लेकर ही रही, क्योंकि इन दोनों का सीधा असर आम परिवारों, छात्रों और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ने वाला है।

राजनीतिक नजरिए से भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ओडिशा जैसे राज्य में, जहां आदिवासी और पिछड़े वर्गों की बड़ी आबादी है, वहां शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े फैसले सीधे सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम सिर्फ नीति सुधार के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि यह निर्णय पूरी तरह जनसंख्या, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर लिया गया है।

कुल मिलाकर, ओडिशा सरकार का यह फैसला राज्य की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। SC और ST छात्रों के लिए आरक्षण बढ़ाना और SEBC वर्ग को पहली बार इस स्तर पर शामिल करना हजारों छात्रों के भविष्य को प्रभावित करने वाला कदम है। अगर यह नीति प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य प्रोफेशनल क्षेत्रों में सामाजिक प्रतिनिधित्व का स्वरूप बदलता नजर आ सकता है। इसके साथ मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना का ऐलान यह संकेत भी देता है कि राज्य सरकार शिक्षा और कल्याण, दोनों मोर्चों पर अपने सामाजिक एजेंडे को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाना चाहती है।

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